राजा महाराजाओं के जमाने से ही मौजूदा सरकारों के कार्यकाल के दौरान पिछले 909 वर्ष पहले सेआजतक सुखानंद धाम परिसर में मेला लगने का सफर जारी

गोपाल नरवाडिया
अठाना ,! महर्षि वेदव्यास के पुत्र बाल ब्रह्मचारी सुखदेव मुनि सुखानंद के घनेजंगलों में गौर तपस्या किया करते थे, उनकी तपस्या से यहां पहाड़ी के ऊपर स्थित गुफा में गंगा मैया प्रकट हुई जिसे बाद में इसे गंगा गुफा कहा जाता है संवत 1165 मैं हुई थी मूर्ति की स्थापना यहां पर गुजरात प्रांत के एक महान संत का आगमन हुआ उनके द्वारा प्राचीन शिलालेख के आधार पर विक्रम संवत 1165 के श्रवण शुद्धिपंचमी सोमवार को सुखदेव मुनि की मूर्ति स्थापना की गई थी इसका प्रमाण विक्रम संवत 1172 के उत्कीर्ण शिलालेख में अंकित है गुजरात से आए बारु गिर गोस्वामी के ही सुखदेव की मूर्ति की स्थापना की गई थी सुखदेव मुनि यहां पर प्रतिदिन गडा किया करते थे इसपर एक दिन मुनिराज को पूजा पाठ में विलंब होने पर स्वयं भागीरथी ने प्रसन्न होकर उनसे कहा आप इतना कष्ट क्यों करते हो मैं ही आपकी गुफा में आ जाऊंगी आप अपने कोविड कमंडल यही रहने दो दूसरे दिन मुनिराज को कमंडल आदि गुफा में पानी के अंदर तैरते मिले जिसे आज गंगा गुफा के नाम से जाना जाता है, बस्सी गांव के नारायण पिता अमृतलाल पड़रिया के द्वारा सीडीओ पर लोहेकी सलकाएं एवं गुफा के पास दरवाजे का निर्माण करवाया जिसे आज सूरज पोल कहा जाता है 1928 में संस्कृत विद्यालय संचालित होता था सुखानंद में स्वामी हरि नंद सरस्वती द्वारा संस्कृत विद्यालय की स्थापना की गई थी जीवाजी राव सिंधिया की आजादी से पहले ग्वालियर रियासत के महाराज थे उन्होंने उसजमाने में 55000 की राशि सहयोग किया था जिसमें ₹10000 सुखानंद के जिढोदार के लिए वह 45000 रुपए की राशि से संस्कृत विद्यालय का संचालन किया जाता था कांग्रेस हो या बीजेपीदोनों ही के कार्यकाल में सुखानंद मैले का भवयता प्रधान करने का प्रयास किया गया था, यानी की राजा महाराजाओं के जमाने से ही मौजूदा सरकार के कार्यकाल के दौरान पिछले 909 वर्ष से सुखानंद धाम परिसर में मेला लगनै का सफर आज दिनांक तक जारी हमारी भारतीय संस्कृति की पहचान आधुनिकता की दौड़ से हमसे दूर हो रहे हैं फिर भी प्रशासन द्वारा वर्षों पुरानी परंपराओं को से दूर हो रहे हैं फिर भी प्रशासन द्वारा वर्षों पुरानी परंपराओं को जारी प्रत्येक वर्ष वैशाख की पूर्णिमा को मिला आयोजित किया जाता है, तीन दिन तक लगेे वाला मिले में पहुंचने वाले लोगों की संख्या कम हो गई है क्योंकि विषण गर्मी के कारण लोग मेला देखने नहीं पहुंचते हैं दूसरा कारण 100 फीट ऊंचाई से गिरने वाला झरना गर्मी के मौसम से बंद हो जाता है जबकि 40 वर्ष पूर्व गर्मियों के मौसम में ही यह झरना गिरता था आधुनिकता की दौड़ मैं पारंपरिक मैले का महत्व कम होता जा रहा है

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Author: jtvbharat