
मिट्टी से दीए, बर्तन और दूसरी चीजें बनाने की कला अब विलुप्त होने की कगार की ओर धीरे धीरे बढ़ रही है…….
संघर्ष से सिद्धि – संदीप राठौड़
डही।/:- कबीर ने कभी कहा था की “माटी कहे कुम्हार से, तू क्यों रौंदे मोय, एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय। जिसका अर्थ है कि समय परिवर्तनशील है। कभी एक सा नहीं रहता। कबीर के यह दोहे प्रजापति समाज की आज की स्थिति को दर्शाते हैं। गीली मिट्टी को उंगलियों से नया आकार देने वाले यह लोग आज अपनी कला को बचाने के लिए अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
दिवाली के लिए दीए बनाने में जुटे इस समाज के लोग डही पुराना बस स्टैंड में कुम्हारों का मोहल्ला है. जहां एक दशक पहले तक दूर-दूर से लोग आकर दीए खरीदते थे. अब वैसा माहौल नहीं रहा लेकिन इस साल अपनी-अपनी तैयारी के अनुसार इस वर्ष दीपावली की तैयारी में 10000 से लेकर 25 और 30000 की तादात में दीए तैयार किए हैं। उन्हें उम्मीद है कि इस दिवाली पर उन्हें अच्छा मुनाफा होगा। दिवाली को देखते हुए जी तोड़ मेहनत कर पूरा परिवार मिट्टी का दीया बना रहे है।दिवाली पर मिट्टी के दीयों से कमाई की उम्मीद में इस समाज के लोग विरासत में मिली परंपरा खत्म होने का दुख: मुनाफे की उम्मीद और खुशी के बीच इनके चेहरे पर शिकन भी देखी जा सकती है। यह दु:ख भी है कि उनके बच्चे अब विरासत में मिली इस परंपरा को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। काम की जटिलता के कारण अब मिट्टी को नया रूप देने वाली यह नायाब कला विलुप्ति की तरफ बढ़ रही है।
दिवाली में अच्छी कमाई की उम्मीद 15000 दीया बनाए, नई पीढ़ी नहीं करना चाहती कुम्हार का काम । गोपाल प्रजापति पेशे से कारीगर हैं, पिछली कई पीढ़ियों से वह मिट्टी के दीए, मटके बनाकर अपना घर चलाते हैं। यह कला उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है। लेकिन अब गोपाल कहते हैं कि कुम्हार जब मिट्टी से कोई कलाकृति बनाते हैं। तभी से मेहनत बहुत लगती है, खर्च बढ़ गए हैं। मिट्टी भी आसानी से नहीं मिलती. काफी दूर से मिट्टी घर तक लाना पड़ता है। इस साल दिवाली के लिए लगभग 15000 दीए तैयार किए हैं। उम्मीद तो है कि अच्छा मुनाफा होगा, लेकिन घटती डिमांड और ज्यादा मेहनत के कारण मुनाफा पहले से कम हुआ है। यही कारण है कि आने वाली पीढ़ी इस काम को नहीं करना चाहती।
दिवाली पर दीए बनाने में जुटा परिवार
मैंने तो अपने बाबूजी से यह कला सीखी थी. लेकिन मेरा बेटा अब यह काम नहीं करना चाहता। वह किसी और तरह के काम कर रहा है। इसलिए मेरे बाद अब परिवार में मिट्टी की यह कला अगली पीढ़ी तक शायद ही हस्तांतरित होगी. नए बच्चे इस काम को अपनाना नहीं चाहते.-गोपाल प्रजापति डही बचपन से ही कर रहे दीया बनाने का काम :डही बस स्टैंड स्थित कुमार मोहल्ले में अन्य कुम्हार पवन प्रजापति कहते हैं कि जब वह 10 12 साल के थे तब से पिता के साथ दीया बनाने के साथ मिट्टी के बर्तन इत्यादि बनाने का काम सीखा था। पहले तो इतनी सुविधा नहीं थी, लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक चाक से ही काम करते हैं। थोड़ी सुविधा है, लेकिन खर्च बढ़ गया हैं। दीया सुखाने और इसे पकाने के लिए भट्टी का इंतजाम करना पड़ता है। बड़ा स्थान चाहिए, इस बार लगभग 20000 से 25000 दीया तैयार किए हैं।
“मेहनत ज्यादा कमाई नहीं” प्रजापति परिवार से ताल्लुक रखने वाले युवा ओम प्रकाश प्रजापति कहते हैं कि मेरे पिता दीया बनाने का काम करते थे. लेकिन वह अब इस काम को नहीं करना चाहता। उनका कहना है कि कुम्हार के काम में मेहनत बहुत ज्यादा है और कमाई कुछ भी नहीं. इसलिए वह कटलरी का काम करते हैं। ओम प्रकाश का कहना है कि मिट्टी के दिए का काम करने पर सिर्फ सीजनल काम मिलता है लेकिन कटलरी का काम करने से 12 महीने चलता है। जिसमें इस कार्य से के काम से ज्यादा मुनाफा होता है। इसके अलावा वह मूर्तियां बनाने का भी काम करते हैं।युवा प्रजापति का कहना है कि यह काम अब विलुप्ति की कगार पर है। यहां जितने भी प्रजापति समाज के लोग रहते हैं, उन घरों के युवा विरासत में मिली मिट्टी की कला के काम को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। क्योंकि आज के जीवन के हिसाब से जो कमाई होती है उससे घर नहीं चल सकता।