
पीला मोजैक एवं अतिवृष्टि के कारण सोयाबीन में पूरी तरह दाने नही आए
खिलेड़ी , बदनावर । राजेश चौहान
वैसे तो किसान जितना धैर्यवान और उसका कलेजा है शायद ही किसी भी क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यवसायियों, उद्यमियों, शासकीय सेवको या दैनिक वेतन भोगियो का होगा। अन्नदाता का तमगा लेकर खुश तो है लेकिन समय की करवट,प्राकृतिक मार व शासन के नियमों की विसंगतिया उसे हताश कर देती है और अप्रिय निर्णय को गले लगाना पड़ता है। ऐसा ही एक मामला सोयाबीन की फसल के ढेर को आग लगाने का खिलेड़ी में देखने को आया है। फसल को आग लगाने के पीछे मजबूरी भी यह थी कि खड़ी फसल को मजदूरों द्वारा काट कर ले जाने एवं कटी हुई सोयाबीन को थ्रेशर मशीन संचालक के द्वारा उपज निकाल कर ले जाने के बाद भी कोई तैयार नहीं हुआ। नतीजतन फसल के ढेर को आग लगाना पड़ी।
खिलेड़ी के किसान दिलीप पाटीदार ने बताया कि 10 बीघा जमीन में आरवीएस 1135 किस्म की सोयाबीन की बोवनी की थी। प्रारंभिक अवस्था में सोयाबीन फसल बेहतर स्थिति में थी पककर तैयार होने के अंतिम पड़ाव तक वायरस, पीला मोजैक एवं अतिवृष्टि के कारण सोयाबीन खेत में ही फलियों में दाने नहीं बन पाए। फसल कटाई के पूर्व लगातार अतिवृष्टि ने होने वाले आशिक उत्पादन पर भी पानी फेर दिया। खेत में लगातार नमी होने के कारण हार्वेस्टर से फसल की कटाई नहीं हो पाई। इधर फसल की कमजोर स्थिति को देखते हुए किसान ने गांव के मजदूरों को ही खेत से फसल काटकर अपने घर ले जाने को कहा परंतु अर्थ और स्वार्थ के घोड़े पर सवार मजदूरो ने भी फसल कटाई करके ले जाने से इनकार कर दिया। परेशान किसान ने दो हजार प्रति बीघा की दर से मजदूरों से फसल की कटाई करवाई एवं खेत में ही फसल का ढेर करवाया।
फसल निकालकर ले जाने को भी तैयार नहीं हुए।
सोयाबीन की फसल को थ्रेशर मशीन से गहाई करके उपज निकालने वाले ट्रैक्टर संचालकों को फसल का ढेर निकाल कर स्वयं ले जाने के लिए भी कहा परंतु सोयाबीन के डंठलों पर फलियां की मात्रा लागत निकालने के अनुपात में कम दिखाई दी तो यह सौदा उधार का घी पीने जैसा प्रतीत होने पर थ्रेसर संचालको ने फसल की गहाई करने से इनकार कर दिया। सभी दूर से आर्थिक प्रहार से जूझ रहे किसान ने अपने कलेजे पर पत्थर रखकर फसल के ढेर को आग के हवाले करना उचित समझा।
फसल को स्वयं आग नहीं लगा सका किसान।
जमीन का सीना चीर कर फसल उपजाने का साहस रखने वाले किसान को इस फसल ने आर्थिक रूप से तोड़ दिया। परन्तु लागत भी ना दे सकी फसल को जलाने के पूर्व साहस रखने वाले किसान का दिल पसिज गया एवं फसल के ढेर को आग मजदूर के हाथों लगवाई। एकत्रित फसल जलती गईं व खेत में शेष कटी हुई फसल को मजदूर गठरी से लाकर जलते हुए ढेर के हवाले करते गए। देखते ही देखते किसान के अरमान आग की लपटो में स्वाह होकर आसमान की और प्रस्थान कर गए। किसान दिलीप पाटीदार ने बीमा कम्पनी व सीएम हेल्पलाइन पर भी शिकायत दर्ज कराई थी
हालांकि बीमा कम्पनी के प्रतिनिधि ने मंगलवार को खेत पर पहुंचकर निरिक्षण किया एवं कागजी कार्रवाई को अंजाम दिया।
मुनाफे की जगह आर्थिक नुकसान देने वाली सोयाबीन किस्म फसल की कागजी कार्रवाई पीड़ित किसान को फसल बीमा का लाभ दिलवा पाएगी या नियमों की विसंगति में की आंच में फसल की तरह जाँच जलकर राख़ हो जाएगी, यह अभी भविष्य के गर्भ में छुपा है।
इनका कहना है
लगभग पुरे तहसील क्षेत्र में सर्वे कर क्रॉप कटाई की गईं है अब सुखवन की प्रक्रिया चल रही है। निर्धारित कटाई क्षेत्र से निकली सोयाबीन के सूखने व उत्पादित मात्रा पर नुकसानी का प्रतिशत होगा। कृषि राजस्व व बीमा कंपनी ने संयुक्त प्रक्रिया पूर्ण की है। इस वर्ष बीमा मिलने की संभावना है। फिर भी 3 वर्षों की आनावारी पर निष्कर्ष तय होगा।
सुरेश नागर तहसीलदार बदनावर