परमपूज्य पद्‌मश्री कांता दीदी के जन्म सताब्दी वर्ष के अवसर पर उनके जीवन एवं संघर्ष, त्याग एवं सेवा का एक संगम पर

रघुनाथ सेन
बड़वानी:- आधारित स्मारिका का लोकार्पण कल दि. 22 फरवरी (मां कस्तूरबॉ की पुण्यतिथि) के अवसर पर किया जाएगा ।
यह लोकार्पण श्री श्री 1008 अवधूत नर्मदानंद बापजी के कर कमलों एवं क्षेत्रीय विधायक श्याम बर्डे के मुख्य आतिथ्य तथा पं. मेवालाल पाटीदार के विशेष आतिथ्य कन्हैयालाल सिसौदिया की उपस्थिति में संपन्न होगा।
इस अवसर पर कस्तूरबॉ वनवासी कन्या आश्रम की प्रतिभाशाली बालिकाओं को पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे।
महात्मा गांधी की प्रेरणा पूज्यनीय कस्तूरबा गांधी जिन्हें गांधावादी बॉ के नाम से जानते है उनका निधन 22 फरवरी 1944 को हो गया था। सो प्रतिवर्ष 22 फरवरी को कस्तूरबा वनवासी कन्या आश्रम निवाली में प्रतिवर्ष उनकी पुण्यतिथि मनाई जाती हैं। परम पूज्य कांता दीदी पर विशेष –
उल्लेखनीय है कि आदिवासी उत्थान में अपना पूर्ण जीवन अर्पण करने वाली परम पूज्य कांता दीदी का क्षेत्र के आदिवासी समाज में विशेष स्थान है। 1950 का वह समय जब देश आजाद हीं हुआ था, भारत में घोर गरीबी थी, समाज में नारी का स्थान नहीं के बराबर था, उनका कोई विशेष महत्व नहीं था, उन्हें स्कूल भेजना, शिक्षित करना तो दूर की बात थी । आदिवासी समाज में तो पुरुषों की शिक्षा दर काफी नहीं के बराबर तो महिला शिक्षा को सोचना हीं व्यर्थ था।
ऐसे में दिल्ली के नजदीक हापुड की जमींदार परिवार में जन्मी युवा कांता त्यागी ने 27 वर्ष की आयु में ठक्कर बप्पा की प्रेरणा में आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा का बेड़ा उठाया, व मशाल हाथ में ली, जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता था।27 वर्ष वह उम्र होती है जब युवा अपने उज्ज्वल भविष्य में खोया रहता है। भौतिक सुख सुविधाओं की जंजीर में जकडा रहता है। लेकिन युवा कांता के मन में तो कुछ और हीं चल रहा था, वह इन भौतिक सुविधाओं को छोड आदिवासी समाज की सेवा का संकल्प ले चुकी थीं । उनके जीवन का अगर बारिकी से विश्लेषण करें, तो लगता है कि मानो गौतम बुद्ध की वह आत्मा थीं। हम यह इसलिए कह रहे है कि बुद्ध और दीदी के जीवन में अनेक समानताएं थीं। जिस तरह बुद्ध ने राजपाट को ठोकर मार बैरागी हो गए थे, उसी प्रकार दीदीं भी जमींदार परिवार में जन्मी थी, लेकिन सब छोड जंगल में आदिवासी बालिकाओं को शिक्षित करने के लिए सब कुछ छोड दिया।
करुणा की प्रतिमूर्ति:
दीदी ने आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा के लिए 1953 में मात्र 5 बालिकाओं से कस्तूरबा वनवासी कन्या आश्रम की स्थापना की।
इस संस्था का आज म.प्र. के साथ-साथ भारत में अपना स्थान है। इसी प्रकार दिव्यांगों के उत्थान के लिए श्री कांता विकलांग ट्रस्ट बनाया। क्षेत्र की नारी को सशक्त करने के लिए शांति, महिला गृह उद्योग एवं स्वयं सहायता बैंक की भी स्थापना की।
पुरस्कार
उनके इस सेवा को म.प्र. शासन एवं भारत सरकार ने समय-समय पर सलाम किया। एवं अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया।

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Author: jtvbharat