
जेसे तैसे..परंपरा कायम रखे हुए हें
सामाजिक सोच वाले युवा…
रमेशचन्द्र राठोर”जोगमाया”
नीमच। पुराना शहर नीमच सिटी उप नगर यहां पुराने रियासत काल से दशहरे पर रावण दहन नही होता है, पुर्णिमा के दिन होता आ रहा हे।
पहले यहां अपनी परंपरागत शैली मे राम लिला होती थी तीन दिवसीय !
अब समय के अनुसार एक दिवसीय मैले के साथ रावण रुण्डी के मैदान पर रावण दहन कार्य क्रम संपन्न होता आ रहा हे।
यहां तत्कालीन समय मे मैदान को अतिक्रमण से बचाने के लिए पक्का रावण का पुतला निर्माण करवाया गया।
समय के साथ टिवी..फिर मोबाइल..! ने परंपरागत धार्मिक कार्यक्रमों…को प्रभावित कर दिया….
पहले तीन दिवसीय कार्यक्रम होते थे समय के साथ वे कलाकार भी नहीं रहे,
प्रति दिन रात्री मे राम दरबार की
रथ मे सवारी नीकाली जाती थी नाच-गान् एवं भजन-कीर्तन के साथ नीमच सिटी पीपली चौक से मुख्य बाजार मे होते हुवे चारभुजानाथ मंदिर जूना बाजार तक… पहुँचने मे रात बारह-एक बजती थी,उस समय का मनोरंजन यही था दशहरा उत्सव इसमे क ई स्वांग धारी यहां हिस्सा लेते थे, नीमचसिटी मे यहां पर दो अखाड़े तुर्रा..कलंगी के खेल (धार्मिक) का मंचन भी करते थे अखाड़ा उस्ताद के निर्देशन मे जो अन्य भी जगह प्रचलित थे, इसमे जवाबी गीत,दोहे,राग-रागनियों एवं कहानीयों को स्थानीय कलाकार तैयारी कर प्रस्तुत करते थे। ,आज के समय मे नीमच जिले कीसीमा से लगे गांव राजस्थान मे हे वहां यह पारंपरिक खेल होता हे,
परंपरा को जिवित रखने वाले
इसके भी कलाकार नहीं रहे ! क ई वर्षों से..,
बड़ा तुर्रामंडल, छोटा तुर्रा मंडल, कलंगी मण्डल, लुप्त हो गये समय के साथ…!!