हिंगोट युद्ध: 1 नवंबर को तुर्रा-कलंगी दल होंगे आमने-सामने,

परम्परा को निभाने के लिए अग्निबाण से करेंगे एक दूसरे पर वार !
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गौतमपुरा.(जावेद खान)।
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मध्य प्रदेश के इंदौर शहर से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गौतमपुरा
यहां पर दीपावली के दूसरे दिन पड़वा (गोवर्धन पूजा वाले दिन)पर होने वाले हिंगोट युद्ध देश-प्रदेश में प्रसिद्ध है।
तुर्रा दल और कलंगी दल (गौतमपुरा और रुणजी) अपनी पूर्वजों की सदियों से चली आ रही परंपरा को निभाने के लिए 1 नवंबर को हिंगोट युद्ध करेंगे।
हजारों की संख्या में बाहरी दर्शक और आसपास के ग्रामीण इस रोमांचक खेल को देखने के लिए मैदान पर पहुंचते हैं।
वही सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस आयोजन का ना कोई आयोजक होता है, और ना कोई प्रायोजक होता है। इसके बावजूद प्रशासन, पुलिस की टीम व स्वास्थ्य विभाग आयोजन को लेकर तैयारी करता है।
हिंगोट एक ऐसा अंगूठा युद्ध है, जिसमें दो दल एक दूसरे पर जलते हिंगोट फेंकते हैं। लेकिन इसमें किसी भी दल की हार-जीत नहीं होती हैं।
यह दोनों ही दल अपनी पूर्वजों की आपसी भाईचारे की इस परम्परा को जीवित रखने के लिए इस युद्ध बनाम खेल को खेलते हैं।
युद्ध मैदान की सफाई, पानी के टेंकर, रोशनी के लिए हेलोजन, दर्शकों की सुरक्षा हेतु जालिया, वाहन पार्किंग स्थान, घायलों के उपचार हेतु डॉक्टर की टीम के साथ एम्बुलेंस, फायरब्रिगेड, व अन्य कार्यों की व्यवस्था नगर परिषद, विद्युत विभाग, पुलिस प्रशासन द्वारा की जाती हैं।

बैठक में अधिकारियों ने दिए दिशा-निर्देश
हिंगोट युद्ध के लिए रखी गई बैठक में ग्रामीण एसपी हितिका वासल, एएसपी रूपेश द्विवेदी, एसडीएम रवि वर्मा, एसडीओपी राहुल खरे, टीआई अरुण कुमार सोलंकी, नगर परिषद की टीम सहित नगर के गणमान्य नागरिक मौजूद थे।
बैठक मे एसपी हितिका वासल ने बताया कि कम उम्र के युवा युद्ध खेलते समय जोश में होश ना खोये, सावधानी रखें।
एसडीओपी राहुल खरे ने कहा कि हिंगोट मैदान के आस-पास कोई भी हिंगोट बेचता पाया गया तो उस पर कार्रवाई होगी। किसी भी तरह का हुड़दंग करने वाले व्यक्ति को छोड़ा नहीं जाएगा। योद्धा सीमित मात्रा में हिंगोट लाये, शराब पीकर मैदान में ना आए, जनता के बीच हिंगोट फेंकने वालों पर कार्रवाई की जाएगी, मैदान के चारों ओर सीसीटीवी कैमरो से नजर रखी जाएगी।

ऐसे तैयार किया जाता है हिंगोट
हिंगोट बनाने का कार्य नवरात्रि से प्रारंभ हो जाता है। हिंगोट हिंगोरिया नामक पेड़ पर पाया जाता है। हिंगोट में ऊपर से आर-पार छेद कर अंदर से गूदा निकाल लिया जाता है। फल के अंदर बारूद भरकर एक छेद को पीली मिट्टी से बंद कर दिया जाता है। हिंगोट का निशाना सही लगे इसलिए 8 इंच की बांस की किमची बांध दी जाती है। इस प्रकार अग्निबाण तैयार हो जाता है। हिंगोट मैदान पर तुर्रा व कलंगी दल के बीच अग्निबाण युद्ध होता है। दोनों दल में लगभग 30 से 40 योद्धा आमने-सामने होते हैं, युद्ध लड़ने वाले योद्धा ढोल-धमकों के साथ जुलूस के रूप में देवनारायण मंदिर पहुंचने हैं। दर्शन के बाद लगभग 5:00 बजे मैदान पर सभी योद्धा मैदान पर पहुंचते हैं, और संकेत मिलते ही रॉकेट की तरह चलने वाले हिंगोट एक दूसरे पर बरसाना शुरू कर देते हैं। लगभग डेढ़ घंटे चलने वाला हिंगोट युद्ध बिना हार-जीत के समाप्त हो जाता है।

परम्परा को निभाने के लिए होता है युद्ध
हिंगोट युद्ध क्यों और किन परिस्थितियों में शुरू हुआ और इस खेल की उपज कहां से हुई यह प्रश्न आज भी पहेली बना हुआ है। बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने जब से होश संभाला है, तब से हिंगोट युद्ध देखते आ रहे हैं। हिंगोट बनाने की कला सिर्फ स्थानीय योद्धा जानते हैं, इसे बनाने की कोई विशेष ट्रेनिंग नहीं दी जाती है। योद्धा यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी इसे सीखते आ रहे हैं। हिंगोट बनाने का खर्च योद्धा स्वयं उठाते हैं।
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निचे – हिंगोट युद्ध खेलते हुए योद्धा का फाइल फोटो

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Author: jtvbharat