
भारत दुनियाँ का मजबूत गणतंत्र है। अपनी जनतांत्रिक विशेषताओं के कारण दुनियाँ में भारत को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। इस मजबूती का कारण आज़ादी प्राप्त करने के लिए किए गए बलिदान, अंग्रेजी हुकूमत का भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के विरुद्ध किया गया सख्त बर्ताव जिसने देश के नेताओं और भारतवासियों में राष्ट्रीय भावना का संचार किया। आजादी प्राप्त करने के बाद भी भी देश के नीति निर्माताओं की सोच के परिणाम गण भी सक्रिय रहा और तंत्र भी मजबूती के साथ काम करता रहा। आजाद मुल्क के नीति निर्माताओं ने अपनी ईमानदारी निष्ठा और नैतिक मूल्यों से राष्ट्रीय भावना का प्रचार प्रसार किया था।
किंतु वर्तमान दौर में राजनीतिक दलों में चुनावी विजय हासिल करने के लिए मुफ्त की घोषणाएं करने की सनक सवार हो गई। राजनीतिक दलों को ऐसा लगने लगा है कि मुफ्त की सुविधाओं के बैगर चुनावी रण में सफलता नहीं प्राप्त की जा सकती है, अतएव वैचारिक राजनीति करने के बजाए दलों ने मुफ्त सुविधाएं देने की लोक लुभावनी राजनीति करने का प्रचलन बढ़ गया है। राजनीतिक दलों को यह ध्यान रखना चाहिए मुफ्त की सुविधाएं राष्ट्र के निर्माण में सहायक नहीं अपितु बाधक है। इन मुफ्त की सुविधाओं से जहां गण निष्क्रिय और अकर्मण्य हो रहा है, वहीं तंत्र पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है वह कमजोर होता जा रहा है। राष्ट्रीय राजनीति में शामिल तमाम दलों को चाहिए कि वह ऐसी योजनाएं बनाए जो भारत की जनता को आत्मनिर्भर बनाएं, सरकार बैसाखियों के सहारे न जनता स्वाबलंबी बन पाएगी न ही देश आत्मनिर्भर बन सकेगा। किंतु देखा जा रहा है कि भारत में कार्यरत तमाम पार्टियां मुफ्त की सुविधाओं की बरसात करने में लगी है।
आजकल राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा–पत्र किराना दुकानों पर लगी भावसूची के मानिंद नजर आतें है। जिसमें लिखा होता है महिला को इतनी राशि, किसानों को इतनी, युवाओं को इतनी याने यह शहरों में लगी महासेल जैसा दिखाई देता है, जो अपने आकर्षक एवं लुभावने विज्ञापनों से ग्राहकों को अपना उत्पाद खरीदने के लिए आकर्षित करता दिखाई देता हैं। मतदाताओं को लुभाने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा तैयार की गई भावसूची या लुभावने वायदे चुनावी पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाते नजर आतें है। इन चुनावी घोषणा पत्रों में विचार शून्यता साफ नजर आती है। हरेक सियासी पार्टी चुनाव में विजय होना चाहती है। इस हेतु वह सभी प्रयोग करती है। यह जाने बगैर कि इन प्रयोगों का दूरगामी असर क्या होगा। अभी दिल्ली विधानसभा के चुनाव में राजनीतिक दलों ने मुफ्त वितरण की घोषणाओं का अंबार लगा दिया। दिल्ली में विधानसभा के चुनाव 5 फरवरी को होना है। इससे पूर्व दिल्ली प्रदेश की राजनीति में सक्रिय राजनीतिक दलों ने घोषणाओं का पिटारा खोल दिया है। दलों में घोषणाओं की प्रतिस्पर्धा साफ दिखाई दे रही है। मुफ्त की सुविधाओं की घोषणाओं का यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है। मुफ़्त की इन रेवड़ियों का देश और जनता पर दूरगामी प्रभाव सकारात्मक नहीं होंगे यह जानते हुए भी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियां सियासी लाभ के लिए एक से बढ़कर एक घोषणाएं कर रही है। विचार का बिंदु यह है कि क्या मुफ्त की इन घोषणाओं से देश, प्रदेश और जनता का भविष्य संवर रहा है? क्या इन मुफ्त की सुविधाओं से जनता में निष्क्रियता की प्रवृति जन्म ले रही है ? भारत में चुनाव सुधारो की सतत प्रक्रिया चल रही है, किन्तु मुफ्त की रेवड़ियों का प्रचलन घटने के बजाय बढ़ते जा रहा है। इस सिलसिले को रोकना किसी एक की जवाबदेही नहीं यह सामूहिक निर्णय और सामूहिक विचारों से ही संभव है। एक कल्याणकारी राज्य का यह नैतिक दायित्व है कि वह अपनी जनता को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य , रोजगार और आवास उपलब्ध कराए, राज्य अपनी जनता के सामाजिक और आर्थिक हालातों की बेहतरी के लिए कार्य करें, उन्हें आत्मनिर्भर बनाए। जनसंख्या की सुरक्षा और कल्याण के लिए काम करते हुए कानून व्यवस्था बनाए रखना, राज्य को अपनी जनता के आर्थिक विकास के लिए रोजगार के अवसर प्रदान करना चाहिए, उद्योगों को बढ़ावा देना, ओर आर्थिक स्थिरता बनाए रखना शामिल है। सामाजिक न्याय के लिए समानता, न्याय और मानव अधिकारों की रक्षा करना शामिल है। जबकि देखा जा रहा है कि राज्य के द्वारा मुफ्त की सुविधाएं देकर जनता को निष्क्रिय और मुफ्तखोर बनाया जा रहा है। दिल्ली चुनाव और इससे पहले भी राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में सियासी दलों की घोषणाएं मुफ्त में सुविधा देने वाली रही है। मध्यप्रदेश से शुरू हुई लाडली बहना महाराष्ट्र…